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DNA ANALYSIS: America में बाइडेन युग की शुरुआत, राष्‍ट्रपति Joe Biden के सामने हैं ये चुनौतियां

नई दिल्‍ली:  कल 20 जनवरी को शपथ ग्रहण के लिए वॉशिंगटन डीसी जाने से पहले अमेरिकी राष्‍ट्रपत‍ि जो बाइडेन (Joe Biden) ने अपनी कर्मभूमि डेलावेयर में एक भावुक भाषण दिया. भाषण देते समय कई बार उनकी आंखों से आंसू बहने लगे.  असल में 34 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद जब कोई व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुंचता है, तो उसके लिए अपनी भावनाओं पर काबू पाना मुश्किल होता है.  वर्ष 1987 से अब तक जो बाइडेन (Joe Biden) ने तीन बार अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की कोशिश की और अब वर्ष 2021 में उनका ये सपना पूरा हो गया है. इसलिए जो बाइडेन अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाए.

उन्होंने कहा कि उनके जीवन में डेलावेयर का स्थान हमेशा सबसे अलग होगा और जब उनका निधन होगा तब भी उनके दिल पर डेलावेयर का ही नाम लिखा होगा.

अक्सर नेताओं पर उनकी सच्ची भावनाओं को छिपाने का आरोप लगता है.  लेकिन जो बाइडेन ने अमेरिका के 32 करोड़ लोगों के सामने अपनी असली भावनाएं दिखाई हैं और इसलिए वहां के लोगों ने उन पर भरोसा किया. 

बाइडेन के सामने हैं ये चुनौतियां  

जो बाइडेन  से अमेरिका के लोगों को बहुत उम्मीदें हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना होगा.  इन चुनौतियों को आप 5 पॉइंट्स में समझिए- 

पहली चुनौती ये कि जो बाइडेन को कोरोना वायरस से निपटने के लिए बड़े और कड़े कदम उठाने होंगे. 

दूसरी बात बाइडेन पर अमेरिका की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की भी जिम्मेदारी है. 

तीसरी ये कि इससे अमेरिका का मध्यम वर्गीय समाज प्रभावित हुआ है और आय में एक बड़ा अंतर पैदा हुआ है और इस खाई को भरना भी जो बाइडेन के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा. 

चौथी बात रंगभेद के मुद्दे ने अमेरिका को दो हिस्सों में बांट दिया है और इससे वहां सामाजिक सौहार्द भी बिगड़ा है और सबसे आखिरी बात ये कि संसद में हुई हिंसा की वजह से अमेरिका की दुनिया के दूसरे देशों में जो नकारात्मक छवि बनी है उसे तोड़ना जो बाइडेन के लिए सबसे मुश्किल काम होगा. 

Inauguration ceremony में धार्मिक परंपराओं का पालन 

अब हम आपको अमेरिका के चरित्र का एक ऐसा पक्ष भी बताना चाहते हैं, जिसमें धर्म का प्रभाव ज्यादा दिखाई दे रहा है.  अमेरिका का मीडिया दुनिया के दूसरे देशों को लोकतंत्र और धर्म को अलग-अलग रखने पर लेक्‍चर देता है.  लेकिन अमेरिका के नए राष्ट्रपति की Inauguration ceremony में कई धार्मिक परंपराओं का पालन किया गया.  

जो बाइडेन शपथ ग्रहण से पहले वॉशिंगटन  के सेंट मैथ्‍यू  चर्च पहुंचे  और उनके साथ कई सांसद और नेता भी थे.  उनसे पहले जॉन एफ केनेडी  भी यहां आ चुके हैं और जो बाइडेन इस चर्च में आने वाले दूसरे राष्ट्रपति हैं.  वैसे अमेरिका के दूसरे राष्ट्रपति शपथ ग्रहण से पहले अक्सर वॉशिंगटन के ही सेंट जॉन्‍स चर्च (St. John’s Church) जाते हैं. इसे Church of The Presidents भी कहा जाता है.  यानी अमेरिका में राष्ट्रपति के लिए एक खास चर्च भी है.  वर्ष 1816 में इस चर्च का निर्माण हुआ था और उसके बाद के लगभग सभी राष्‍ट्रपति  कम से कम एक बार इस चर्च में जा चुके हैं.  भारत में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लिए कोई विशेष चर्च होने की बात सोची भी नहीं जा सकती है, लेकिन अमेरिका की राजनीतिक परंपराओं में धर्म का विशेष स्थान है. 

शपथ ग्रहण की शुरुआत भी एक धार्मिक अनुष्ठान से हुई. वहां पर एक धर्मगुरु ने भगवान की पूजा की और उनसे शक्ति और आर्शीवाद मांगा. अमेरिका को दुनिया का सबसे आधुनिक, समृद्ध और उदार समाज माना जाता है, लेकिन वहां की राजनीति में धर्म का इतना अधिक प्रभाव होना हैरान करने वाला है. 

इसके बाद जो बाइडेन ने अपने परिवार की 127 वर्ष पुरानी बाइबल पर हाथ रखकर शपथ ली. जब कोई एक परिवार अपनी धार्मिक पुस्तक को इतने वर्षों तक संभाल कर रखता है तो उससे ये पता चलता है कि उनके विचारों में धर्म का स्थान कितना महत्वपूर्ण है और इस कार्यक्रम के अंत में भी एक धर्मगुरु ने अमेरिका के नए राष्ट्रपति को अपना आशीर्वाद दिया. 

भारत में संवैधानिक पद पर बैठे लोग संविधान और ईश्वर की शपथ लेते हैं. जबकि अमेरिका में बाइबल  पर हाथ रखकर ईश्वर की शपथ ली जाती है और भारत में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में ऐसे किसी धार्मिक अनुष्ठान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

ये 2016 का अमेरिका नहीं…

हम ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ये 2016 का अमेरिका नहीं है. इसकी बड़ी वजह ये है कि अमेरिका में हर बार राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह के लिए दो लाख टिकटें वितरित होती थीं. लेकिन इस बार सिर्फ़ एक हज़ार लोगों को ही टिकटें दी गईं और ये आम लोग नहीं थे.  इसकी दो बड़ी वजहेंं हैं, एक कोरोना वायरस और दूसरा पिछले दिनों अमेरिकी संसद में ट्रम्प समर्थकों द्वारा की गई हिंसा. 

लोगों की कमी को इस बार झंडों से पूरा करने की कोशिश की गई. कैपिटल हिल के बाहर दो लाख झंडे लगाए गए.  लेकिन आपको याद होगा जब 2009 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का Innaugration Day था, तब लाखों लोग ये झंडे लहरा रहे थे. लेकिन ये अमेरिका का दुर्भाग्य ही है कि इस बार के Innaugration Day में झंडे लहराने के लिए लाखों लोगों की भीड़ मौजूद नहीं थी. 

आपको जानकर हैरानी होगी कि 2009 में ओबामा के Innaugration Day में 18 लाख लोग शामिल हुए थे.  2017 में जब ट्रम्प ने राष्ट्रपति के पद की शपथ ली तब 6 लाख लोग इसका हिस्सा बने थे और इस बार तो ये संख्या सिर्फ एक हजार रह गई. 

यहां एक महत्वपूर्ण बात ये भी है कि शपथ ग्रहण समारोह की वजह से वॉशिंगटन डीसी में 25 हजार नेशनल गार्ड तैनात किए गए और ये इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि, ये संख्या इस समय ईराक, अफगानिस्तान और सीरिया में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या से ज्‍यादा है.  सोचिए लोकतंत्र पर लेक्चर देने वाला अमेरिका किन हालातों से गुजर रहा है.

राष्ट्रपति चुनाव में सबसे अधिक वोट हासिल किए 

अब हम आपको शपथ ग्रहण समारोह से जुड़ी  वो 10 बातें बताना चाहते हैं, जो शायद आपको पता नहीं होंगी.

– सबसे पहली बात ये है कि जो बाइडेन अमेरिका के सबसे बुजुर्ग राष्ट्रपति हैं. उनकी उम्र 78 वर्ष है और उन्होंने डोनाल्‍ड ट्रंप का 70 वर्ष की उम्र में शपथ लेने का रिकॉर्ड तोड़ दिया. अमेरिका के सबसे कम उम्र के राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्‍ट  रहे हैं, जिनकी उम्र सिर्फ 42 वर्ष थी.

–  जो बाइडेन ने अमेरिका के किसी भी राष्ट्रपति चुनाव में सबसे अधिक वोट हासिल किए हैं. उनको कुल 8 करोड़ 10 लाख वोट मिले. जो बाइडेन ने बराक ओबामा का रिकॉर्ड तोड़ा, जिन्हें वर्ष 2008 के चुनाव में 6 करोड़ 90 लाख वोट मिले थे.

– जो बाइडेन अमेरिका के सातवें उप-राष्ट्रपति हैं जो आगे चलकर राष्ट्रपति चुने गए. अमेरिका में अब तक कुल 48 उप-राष्ट्रपति हुए हैं, जिनमें से 19 ने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ा. 

– जो बाइडेन अमेरिकी इतिहास में दूसरे कैथोलिक राष्ट्रपति हैं. 

–  जो बाइडेन ने पहली बार वर्ष 1988 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ा. दूसरी बार वर्ष 2008 में और तीसरी बार 2020 में जब वो भाग्यशाली साबित हुए और अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए.

– कमला हैरिस अमेरिका के इतिहास में पहली महिला उप-राष्ट्रपति होंगी. 

– वर्ष 1992 के बाद डोनाल्‍ड ट्रंप अमेरिका के दूसरे ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्हें अमेरिका की जनता ने दूसरा मौका नहीं दिया. 

– पिछले 84 वर्षों से अमेरिका के राष्ट्रपति 20 जनवरी को शपथ ले रहे हैं. लेकिन वर्ष 1937 से पहले 4 मार्च को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने की परंपरा थी ।

– अमेरिका के इतिहास में डोनाल्‍ड ट्रंप चौथे ऐसे राष्ट्रपति हैं जो अपने बाद राष्ट्रपति बनने वाले उम्मीदवार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुए. 

– विलियम हेनरी हैरिसन सबसे कम वक्त तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे.  शपथ ग्रहण के सिर्फ 31 दिनों के बाद निमोनिया की बीमारी से उनका निधन हो गया था.

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