DNA ANALYSIS: CM योगी की Film City, फिल्म उद्योग में मुंबई की बादशाहत को नई चुनौती

नई दिल्ली: कल 22 सितंबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बॉलीवुड की कई सेलिब्रिटीज के साथ बैठक की और उत्तर प्रदेश में एक हाईटेक फिल्मसिटी बनाने की घोषणा की है. इस बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेस-वे के पास फिल्म सिटी के लिए जमीन की अनुमति दे दी. इसी इलाके में एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बन रहा है. इस जगह के पास ही फॉर्मूला-वन का रेसिंग ट्रैक भी है. दिल्ली, पश्चिम उत्तर प्रदेश के शहरों और हरियाणा से यह जगह बहुत दूर नहीं है.

फिल्म सिटी बनाने का क्रांतिकारी फैसला
उत्तर प्रदेश में एक बड़ी फिल्म सिटी बनाने का ये फैसला क्रांतिकारी है. क्योंकि जब भी हम हिंदी फिल्म उद्योग की बात करते हैं तो उसका मतलब होता है बॉलीवुड. फिल्मों के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के रहने वाले हैं. बॉलीवुड की तमाम फिल्में जहां पर सबसे ज्यादा देखी जाती हैं वो हैं भारत के हिंदी भाषी प्रदेश जैसे कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान. लेकिन इन्हीं राज्यों से सुशांत सिंह राजपूत जैसा कोई प्रतिभावान कलाकार मुंबई में जाता है तो वहां पर वो बाहरी करार दिया जाता है क्योंकि, मुंबई की इस फिल्म इंडस्ट्री पर कुछ परिवारों ने कब्जा कर रखा है. वो ही फिल्में बनाते हैं और उनमें उनके ही बेटे-बेटी या पसंदीदा लोग एक्टिंग करते हैं. जिन हिंदी भाषी प्रदेशों के लोगों के दम पर उन्होंने अपने बड़े-बड़े साम्राज्य स्थापित कर रखे हैं उन्हीं हिंदी भाषी प्रदेशों के कलाकारों के साथ मुंबई के फिल्म उद्योग में जो व्यवहार होता है वो किसी से छिपा नहीं है.

थाली में छेद करने का आरोप
यूपी, बिहार, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के छोटे-छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर हजारों नौजवान मुंबई जाते हैं लेकिन इन नौजवानों को मुंबई का बॉलीवुड गैंग, स्ट्रगलर, आउटसाइडर और बाहरी कहता है. इसमें कोई शक नहीं है कि बॉलीवुड ने आज जो मुकाम हासिल किया है. उसमें उन लोगों की मेहनत भी शामिल है, जिन्होंने इसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. ये लोग खुद भले ही स्टारडम न पा सके हों या किसी कैंप का हिस्सा ना बन पाए हों, लेकिन ये लोग आज भी अपने अपने शहरों के हीरो हैं. बॉलीवुड में कब्जा जमाए लोग हिंदी भाषी प्रदेशों से आए कलाकारों के योगदान को कभी सम्मान नहीं देते है. उल्टा उन पर ही थाली में छेद करने का आरोप लगा देते हैं.

हिन्दी भाषा की फिल्म इंडस्ट्री मुंबई में क्यों है?
यहां एक दिलचस्प बात ये है कि मुंबई हिन्दी फिल्मों के साथ-साथ मराठी फिल्मों का भी केन्द्र है. ये बड़ा सवाल है कि जब तमिल फिल्मों का केंद्र तमिलनाडु में है, तेलुगु फिल्मों का केंद्र हैदराबाद को माना जाता है, पंजाबी भाषा की ज्यादातर फिल्में भी पंजाब में ही बनती हैं तो फिर हिन्दी भाषा की फिल्म इंडस्ट्री मुंबई में क्यों है? दिल्ली, नोएडा, लखनऊ, पटना या फिर भोपाल में क्यों नहीं?

आज स्थिति यह है कि मुंबई में बनने वाली ज्यादातर हिंदी फिल्मों की शूटिंग दिल्ली और उत्तर भारत के शहरों में होने लगी है यानी हिंदी फिल्मों के बाजार का बड़ा हिस्सा उत्तर भारत में ही है. इसलिए स्वाभाविक है कि हिंदी फिल्म उद्योग अब दिल्ली या किसी आसपास के इलाके में शिफ्ट हो.

कब-कब किया गया फिल्म सिटी बनाने का फैसला
यहां ये बताना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ सालों से फिल्म उद्योग को स्थापित करने की कोशिश हो रही है. सबसे पहले वर्ष 1988 में तब के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने नोएडा के सेक्टर-16 में फिल्म सिटी बनाने का फैसला किया था. वर्ष 2005 से 2007 के बीच में उत्तर प्रदेश के तब के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने फिल्म सिटी को अपग्रेड कराया था. वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 2 फिल्म सिटी बनाने का ऐलान किया. इनमें से एक फिल्म सिटी आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे और दूसरी फिल्म सिटी उन्नाव में बनाने का फैसला किया गया था. उन्नाव में फिल्म सिटी के लिए अभिनेता और बीजेपी सांसद रवि किशन के साथ एक समझौता भी हुआ था. लेकिन इस पर कोई बात आगे नहीं बढ़ी.

अब वर्ष 2020 में योगी सरकार ने गौतम बुद्ध नगर जिले में 1000 एकड़ में फिल्म सिटी बनाने की घोषणा की है.

पहली बार बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के लिए ‘बॉलीवुड’ शब्द का प्रयोग
1976 में सिने ब्लिट्ज नाम की पत्रिका ने पहली बार बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के लिए ‘बॉलीवुड’ शब्द का प्रयोग किया था. तब ये नाम अमेरिका की फिल्म इंडस्ट्री हॉलीवुड की तर्ज पर इस्तेमाल किया गया था. लेकिन आगे चलकर बॉलीवुड मुंबई के फिल्म उद्योग की पहचान बन गया. लेकिन पिछले 2 दशक में बॉलीवुड भी एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है. हिंदी फिल्में भले ही मुंबई में बनती हों, लेकिन उनका बाजार हिंदी भाषी प्रदेशों में है. बाजार के ही दबाव में फिल्मों की कहानियां भी अब हिंदी भाषी प्रदेशों के इर्द-गिर्द लिखी जाने लगीं. उदाहरण के लिए हाल ही में पटना के सुपर 30 कोचिंग इंस्टीट्यूट पर फिल्म बनी, जिसमें लीड रोल रितिक रोशन ने निभाया था. ऐसी फिल्मों की लिस्ट बहुत लंबी है- इनमें बनारस में बनी फिल्म रांझना, बद्रीनाथ की दुल्हनियां और बरेली की बर्फी जैसी फिल्में शामिल हैं.

हिंदी फिल्मों का बड़ा बाजार
रिसर्च एजेंसी KPMG की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल 9600 सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर हैं. इनमें से 970 सिंगल स्क्रीन अकेले उत्तर प्रदेश में हैं. इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है जहां 504 सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर हैं. बिहार में 269 सिंगल स्क्रीन हैं. मध्य प्रदेश में इनकी संख्या 210 है. दिल्ली 80 सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर हैं. मल्टीप्लेक्स को जोड़ दें तो दिल्ली हिंदी फिल्मों का बड़ा बाजार है.

हिंदी भाषी प्रदेशों की ताकत
हिंदी भाषी प्रदेशों की यही ताकत है जिसकी अनदेखी कोई नहीं कर सकता. हम यह नहीं कह रहे कि मुंबई में फिल्म उद्योग नहीं होना चाहिए. लेकिन फिल्मों के इस बाजार में भी प्रतियोगिता होना जरूरी है. ताकि कोई भी फिल्म इंडस्ट्री को अपनी निजी थाली न समझने लगे. तेलुगू फिल्म उद्योग ने इसी मॉडल को अपनाकर बहुत प्रगति की है. आज हैदराबाद की फिल्म इंडस्ट्री में बनने वाली फिल्में देश की सभी भाषाओं में डब होती हैं और करोड़ों का बिजनेस करती हैं. हाल में आई फिल्म बाहुबली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. मतलब ये कि फिल्म उद्योग में मुंबई की बादशाहत को चुनौती पहले से मिल रही है. अब उत्तर प्रदेश भी इस रेस में शामिल होने जा रहा है.

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